31 December 2005

शब्द प्राणायाम - 76 - 80

परम्परा


साधू के वेश में
सीता का हरण
क्या हो गया,
विश्वासघात के रावण का
आज,
चलन हो गया!

















सफाई


अफसर,
कितना ही बड़ा हो
झाडू तो लगायेगा,
कचरा चेहरे का
रोज़ सबुह
ब्लेड,
से हटायेगा !















******


पानी-फेरना


मिटाने के लिए,
सदियों से
आदमी,
ठस-ठस पीता है,
रोटी खाकर
भूख पर
पानी,
फेरता है !
















*******


आँसू


नकल,
रोती आँखों की
वह भी
कर रहा है,
गर्मी में
बूँद-बूँद
नल,
टपक रहा है !
















*******


भाग्य


काश,
कड़वे बबूल में भी
भगवान, आम देता,
बो कर,
पेड़ कोई भी
आदमी,
फल मीठा खा लेता !














******
-रमेश कुमार भद्रावले

********



शब्द प्राणायाम - 71 - 75

बदलाव-२


दायरा
सुरक्षा का
क्या
इतना बढ़ जायगा,
सास को
अब,
बहू जलायेगी
कानून,
बचा ले जायगा !
















*********

अंतर


कुछ लोग
ज़िन्दगी भर
झूठ बोल-बोल कर
पेट भरते रहे,
कुछ मेहनत कर-कर के
भूखे रहे !















*******


बाबू


मुहँ और मतलब
देखकर,
आदमी-सा
काम का आदी हो जायगा,
दिल
जिस दिन,
कम्प्यूटर में डल जायगा !















*******



प्रजातंत्र


बिना तालमेल के
बस, अपना
झंडा गाड़ दिया,
मतभेदों की खटाई ने
दूध-सा,
राजनीति को आज
फाड़ दिया !
















********


वैभव


चाँद पर
धब्बा जो पड़ गया,
गोरे मुख पर
काले धंधों का
तिल जैसा,
सम्मान बढ़ गया!















********

-रमेश कुमार भद्रावले

*********



शब्द प्राणायाम - 66 - 70

पाखंड


धर्म की
पगडण्डी पर
आदमी,
भटक रहा है,
आज भी
आदमी, आदमी की
राह पर नहीं
चल रहा है !















*******


परिवर्तन


परिवर्तन को
आदमी ने
यूँ ढ़ाला है,
बारह माह से
पाले
कलेण्डर को
एक दिन की
जनवरी ने,
बदल डाला है!















******


दशहरा-२


रावण को मारकर
राम ने,
सीता को तो बचा लिया,
काश,
ऐसा कोई राम होता
जो आज,
आदमी में छिपे रावण को
मार पाता !















*********


दीपावली-२


दीपावली
आदमी, कुछ इस तरह से
मना रहा है,
अपने ही हाथों
अपने ही घर को
चूना,
लगा रहा है!














*******

क़ौमी एकता


आदमी से आदमी को
सजा लो,
गुलशन का हर एक
फूल लेकर
क़ौमी एकता का
आज एक
गुलदस्ता बनालो !












-रमेश कुमार भद्रावले

*********







शब्द प्राणायाम - 61-65

सच्चाई


मुसीबत में आदमी
आज
कुछ इस तरह
ढल रहा है,
कि रोता आदमी भी
आज,
हँसता लग रहा है!
















*******

बल्ब


बिजली के बल्बों ने
फ्यूज होकर,
आदमी को भी
कुछ सिखाया है,
सीधा सच्चा
हार्ट अटैक का,
नया दौर चलाया है!















*******


मौत-लहर


लाठियों से
जहाँ,
हमेशा लकीरें पिटती रही हैं,
जिन्दा है, साँप
लहर मौत की
चलती रही है !















*******

दबे पाँव


"दबे पाँव" में
कितना पीछे
बिल्ली को
बिजली छोड़ जाती है,
हज़ारों किलोवाट वाली
पतले से तार से
निकल जाती है!














******


फागुन



साल का हर महीना
मस्ती के रंग में
रंग जाता,
यदि फागुन खुद
अपने साथियों के साथ
होली खेल जाता!













-रमेश कुमार भद्रावले
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20 December 2005

शब्द प्राणायाम - 56 - 60

बोझ

नेताओं से
लदी,
इक्कीसवीं
सदी!














******


दाँती

दिन-रात
झगड़ा,
सास-बहू का
जहाँ चलता है,
कीड़ा
अनाज में
उसी घर में लगता है !














******


गुलाल

राधा-कृष्ण के साथ
लक्ष्मी और विष्णु भी
यदि फागुनी पिचकारी के
साथ होते,
होली और दिवाली जैसे
त्यौहार कभी इतने
दूर-दूर नहीं होते !















******



बदलाव

चकोर,
जाने क्यों
पागल हो गया है,
चाँद पर उसे आज
आदमी,
दिख गया है !















******



उदारता

मग्गे से,
अधिक उदार
कप-बसी को?
माना जायगा,
आने वाला
आखिरी घूँट तक भी
चाय पी जायगा !













*******

-रमेशकुमार भद्रावले
*******




शब्द प्राणायाम - 51 - 55

अतिक्रमण

मुहिम,
प्रकृति ने भी
आदमी की तरह
अतिक्रमण की चलाई है,
सुनामी लहरों ने
मुहर, कहर की
झूमती ज़िन्दगी पर
लगायी है !














******


आत्मसमर्पण

डाकू का
आत्मसमर्पण क्या हो गया,
चम्बल का शेर
सरकस में
आ गया !












******


टेसू

जड़ से
चोटी तक
उसे,
सूखा छोड़ देता है,
होली पर आदमी
टेसू को,
पूरा निचोड़ लेता है !














******



रोजगार

काम या बन्दरिया से
सचमुच,
जीवन चलता है,
पेट आदमी का
दोनों से,
पलता है !











******


खाद

देशी,
पौधों को
विदेशी,
खाद देकर
बढ़ा रहे हैं,
बच्चों को आज
कॉन्वेन्ट में
पढ़ा रहे हैं !












******

-रमेशकुमार भद्रावले

*****

शब्द प्राणायाम - 46 - 50

माँ-बाप


चलें,
मर्जी पर जब तक
उनकी,
बेटा-बेटा लगता है,
सिक्का अपना
चपेट मे बहू की
खोटा लगता है!














******

अभागे

पवित्र मानकर
हज़ारों लोग
गंगा-यमुना में नहाते हैं,
एक डुबकी भी जो
आज तक, नहीं लगा पाये
कितने अभागे
किनारे होते हैं !














*******

जल्लाद

डालकर फंदा गले में
रस्म,
दुश्मनी-सी निभाना
होती है,
जल्लाद,
आदमी नहीं,
नौकरी होती है!














******


वारंट

सबसे पहले
सतर्क वो
हो जाते हैं,
सफेद होकर
बाल,
संत हो जाते हैं!













******

दाढ़ी

कितना काला काम
दिन भर में
आदमी
कर जाता है,
रोज़,
साफ़ चेहरे पर
दाढ़ी का बढ़ना
बताता है !













*******

-रमेशकुमार भद्रावले
*****

शब्द प्राणायाम - 41 - 45

चलता-पुर्जा

लाँघकर,
झूठ की सीमा
नेता,
चलता-बनता है,
आश्वासन के
अंगारों में
वोटर जलता है!















*****


आकलन


धाँधली, रिश्वत, भ्रष्टाचार
ना ही कभी कुछ
सुनने में आया,
पुरस्कार योग्य तो
सिर्फ,
मलेरिया विभाग कहलाया!
















*****


आत्म-सम्मान


पानी तो,
आदमी से अधिक
उसमें भी होता है,
कटते ही
क्रोध, में
लाल-लाल
तरबूज होता है!














*****


शिक्षक दिवस


दक्षिणा में
हमारी संस्कृति ने
अँगूठा तक काटकर
दिया है,
गुरु का सम्मान
हमने आज
पाँच सितम्बर से
जोड़ दिया है!














******


बिल्ली


जब चाहे तब
भाग जाती है,
आजकल खिड़कियाँ
बिजली के बल्बों में
भी पाई जाती हैं













*****

-रमेशकुमार भद्रावले

*****

19 December 2005

शब्द प्राणायाम - 36 - 40

रानी

घर ही, नहीं
सदियों से शासन
चला रही है,
एक छत बनाकर
मधुमक्खी,
नारी को सिखा रही है!















*****


आँकड़ा

राम-लक्ष्मण-सीता को
वनवास क्या हो गया,
आँकड़ा तीन का
आज,
बदनाम हो गया!
















*****


व्ही.आर.एस

सोने के
पूरे अंडों का लालच
आदमी को
फिर आया है,
फाड़कर पेट
मुर्गी-सी, नौकरी का
खूब पछताया है!














*****


सुनामी लहरें

बता-बता कर
आँकड़े
हल्ला मचा रहे हैं,
करोड़ों का ख़र्च
चुनावी लहरों का
छुपा रहे हैं!
















*****



जाँच

काटने लग जाता है
याद,
जब भी उसे
रोटी की आती है,
ख़ून में
मलेरिया नहीं
मच्छर की भूख आती है!














******

-रमेशकुमार भद्रावले
*****


शब्द प्राणायाम - 31 - 35

भजिया

स्वाद में
कितना अच्छा
आदमी को
लगने लग गया है,
भ्रष्टाचार
आज एक,
भजिया हो गया है!















*****


सीमेन्ट

पत्थरों को जोड़कर
कितना मज़बूत भवन
आदमी
बना रहा है,
काश,
ऐसी कोई सीमेन्ट होती
जो आज
आदमी को आदमी से
जोड़ देती!
















*****

बहन

कल की
आने वाली से
इतना नाता
जोड़ लिया है,
शक्कर ने
चाय के साथ मिलकर
अकेला,
गुड़ को छोड़ दिया है!














*****


खेत

लहलहाती फसल का
समूचा विश्व
शिकार हो गया है,
बीमारियों के लिए
उपजाऊ बीज
आज,
टेंशन हो गया है!














*****


सयानी

आज तक गुर अपना
दुनिया में,
किसी को नहीं सिखाया
अपना जाला
हमेशा,
मकड़ी ने बनाया!









****

-रमेशकुमार भद्रावले
****

शब्द प्राणायाम - 26 - 30

ईद

ईद के
अधूरे चाँद ने
मोहब्बत का पैगाम
यूँ दिया,
कि आदमी को आदमी से
गले लगा दिया!















*****

नागपंचमी

अपने ज़हर को
अमृत बनाने का प्रयत्न
साँप भी करता है,
एक बालक की तरह
दूध,
जी भर कर पीता है!













*****

पी-एच.डी.

जाने क्यों आदमी
आज,
अपने ज्ञान का
दिवालियापन दिखा रहा है,
सूर और तुलसी की
एक उक्ति पर
पी-एच.डी करके
नेम प्लेट
लगा रहा है!















*****

दशहरा-१

जाने क्यों आदमी
आज,
हर बार बुराई को
सामने ला रहा है,
दशहरे पर हर साल
रावण जलाकर
सिर्फ, राम को
भुलाया जा रहा है!














*****


दीपावली-१

स्वागत में,
रात भर जला माटी का
छोटा-सा दिया,
आज तक
लाभ लक्ष्मी का
बडे-बड़े चाँद-सूरज ने
लिया !














*****

-रमेशकुमार भद्रावले

*****

शब्द प्राणायाम - 21 - 25

न्याय

न्याय की विश्व में
आज,
कोई परिभाषा होती,
भूख को मारने में
यदि,
रोटी को सज़ा होती!














*****


अधूरा चाँद

सबक़,
आदमी को अब
अधूरा चाँद
सिखाये,
आदमी को देखकर
आदमी,
ख़ुशियाँ मनाये !















*****


नव वर्ष

बदलकर
निश्चित समय के बाद
नया वर्ष
आता है,
नव वर्ष की
शुभ-कामना देने वाला
आदमी,
जब-चाहे-तब
बदल जाता है!















*****


जागरूकता

जागस्र्क होकर
आदमी,
जाग गया है
आज आदमी से आदमी
कितनी दूर
भाग गया है!















******


पुण्य

हरी मिर्च खिलाकर
आदमी,
पुण्य कमा रहा है,
पिंजरे के तोते से
आज,
राम नाम जपवा रहा है!














****

-रमेशकुमार भद्रावले


18 December 2005

शब्द प्राणायाम 16-20

विद्यार्थी

आगे-बढ़ने
की लगन में
कितना मदमस्त
हो जाता है,
दिमाग बिना
दीमक भी
पूरी पुस्तक
चाट जाता है!










****

बेर

जीभ लक्ष्मण की
आम नागरिक-सी
ललचाती है,
देश में राम और शबरी से
मीठे बेर,
इल्लियाँ खाती हैं!














*****

बिजली

आज की बिजली
असल की
नकल कर रही है,
देखकर
बादलों की बिजली
चमक कर
बुझ रही है!













*****

विश्व शांति

सचमुच,
बुद्धि से बड़ी भैंस है,
आदमी जान जाता
किसी का कुछ बिगाड़ देना
भैंस को नहीं आता,
काश,
भैंस का सिर्फ यह गुण
आदमी में आ जाता
आज विश्व में,
न्यूट्रान एवं हाईड्रोजन
बम नहीं बन पाता!












*****

चीर हरण

कौरवों ने
द्रोपदी का
चीर- हरण
क्या किया,
फैशन का
दु:शासन भी आज
नारी को
नंगा,
बना रहा है!











****
-रमेशकुमार भद्रावले
***

शब्द प्राणायाम 11-15

कुर्सी

कुर्सी हमेशा
आदमी से बड़ी
होती है,
चूँकि
कुर्सी की
टाँगें चार
होती हैं!
















*****


बँटवारा

पानी की
एक बूँद का
जब विश्व में
बँटवारा किया गया,
कतार में
सबसे आगे
समुद्र,
पाया गया

















*****
कलियुग

मानवता के विघटन को
आदमी,
कलियुग कह रहा है,
ज्ञान के घोंसले में
आज,
स्वार्थ पल रहा है!















*****


समय

जब मैं पढ़ता था
तब,
पुस्तकें फाड़ा करता था,
आज
फटी किताबों में
नई,
ज़िन्दगी ढूँढ़ता हूँ!


















******


दोस्ती

कृष्ण और सुदामा की
दोस्ती का सिलसिला
आज तक
चला आ रहा है,
दोस्ती में पानी भी
दूध के साथ मिलकर
दूध के भाव,
बिकता जा रहा है!

















*****

-रमेश कुमार भद्रावले
****

शब्द प्राणायाम- 06-10

चींटी और कबूतर

तिनके का सहारा देकर
डूबती चींटी को
कबूतर ने बचा लिया,
स्वार्थ की एक बूँद में
आज
डूब गया है आदमी



















*****

उल्कापात

धूम्रपान,
कभी-कभी
चाँद तारे भी करते हैं,
ऐश-ट्रे
समझकर गुल
धरती पर
गिरा देते हैं!
















****


साँचा

तराशी हुई
संस्कृति
दो शब्दों में
सँवर गई,
कर्त्तव्य में रामायण
कर्म में,
गीता ढल गई!
















*****

कर्म

बादल,
अँगुलियों की मेहनत के
जब,
उमड़-घुमड़ के आते हैं
लक्ष्मी के फोटो जैसी
दौलत,
हथेली से बरसाते हैं!

















****


कटौती

देश को
फिर से हमें
सोने की चिड़िया
बनाना है,
कटौती के स्र्प में
चिड़िया के पर
नहीं लगाना है!

















****


बाल-विवाह

चलन,
बाल-विवाह का
समाज में
क्या हो गया,
अंडे से निकला चूजा,
दूल्हा हो गया !
















****
-रमेशकुमार भद्रावले
****

शब्द प्राणायाम- 01-05

प्राणायाम

घोंघा,
बीमारियों का
जीवन-समुद्र में
चलता है,
स्वास्थ्य जैसा
मोती,
योग और प्राणायाम की
सीपी में,
पलता है!














*****

अकाल

कुछ लोग
भूख से मर
रहे हैं,
कुछ
भूख के लिए
मर रहे हैं!
















****

रोटी

रोटी की ज़िन्दगी
आज,
कितनी कम हो गई,
बनी,
तवे पर चढ़ी
और
ख़त्म हो गई!















****

सिकन्दर

दुनिया को
जीतने की धुन में
फिर एक
सिकन्दर निकल गया है,
हर चीज में झंडा
मिलावट का
गड़ गया है!
















****

सफलता

जाकर चाँद पर
आदमी,
मिट्टी ले आया है,
आज तक
आदमी, आदमी तक
नहीं पहुँच
पाया है!














****

-रमेशकुमार भद्रावले

09 December 2005

क्षणिका














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