08 January 2006

शब्द प्राणायाम - 108 - 113

पानी


पानी बचाओ
पानी बचाओ
का डंका,
आदमी बजा रहा है,
पानी बचाने वाला
सिर्फ
पसीने से नहा रहा है !











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बाढ़


खून आदमी का
ख़तरे के निशान से
कितना ऊपर
हो गया है,
क्रोध, आक्रोश
और मानसिक तनाव में
आदमी,
डूब गया है !










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पहुँच


लोमड़ी की तरह
आज तक बस
मतपेटी तक पहुँच पाये हैं,
हिस्से में हमेशा
आम नागरिक के
सिर्फ
खट्टे अंगूर आये हैं !












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सूखा


देश में
सूखा क्या पड़ गया,
आदमी का आज
पानी उड़ गया !










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सूली


आज भी
उसे मालूम है
उस दिन भी उसे मालूम था,
कीलें बनाने,
और ठोकने वाला
सिर्फ
आदमी था !











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सज़ा


घिस-घिस कर
किसी दिन
ख़त्म हो जाती है,
मिटा देने की
सज़ा तो,
रबर भी पाती है !










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-रमेशकुमार भद्रावले

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शब्द प्राणायाम - 102 - 107

धरातल


आदमी के
आकलन का पैमाना
आज,
यू चलता है,
बड़ा वो है
जो ज़मीन पर नहीं,
परदे पर चलता है !









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स्मृति


भुलावे की
कोई आँधी
नहीं बुझा पाती,
यादों की तुम्हारी
नन्हीं बाती !










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योग


परम्परा
ऋषि-मुनियों की
शब्द भी,
निभा रहे हैं,
योग और प्राणायाम से
भाषा को
समृद्ध और निरोगी
बना रहे हैं !











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साधना


कड़ी मेहनत और
साधना में ढली
जेम्सवॉट की भाप को
बच्चों का खेल
मत बनाओ,
एक के पीछे एक आओ
रेल बनाओ, रेल बनाओ !










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जुआँ


बन्दर की तरह
आपस में, माँ -बेटी
देखते-देखते जुआं
एक षड़यंत्र रच देती हैं,
दहेज के नाखूनों पर
जुआं की तरह
बहू को,
मसल देती हैं !










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हैजा


हैजे की तरह
पाप और अत्याचार से
पृथ्वी,
जब त्रस्त हो गई,
निकलकर
जटाओं से गंगा
बाटल,
ग्लूकोज की हो गई !










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-रमेशकुमार भद्रावले

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शब्द प्राणायाम - 96 - 101

मतदान

पन्द्रह दिन की
निराई-गुड़ाई में
वर्षो की
फ़सल पैदा करता है,
आज आदमी
खेत में नहीं,
चुनाव में मेहनत
करता है !
















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सच्चाई - २


पाल कर कुत्ता
आदमी,
भौंकना तो सीख गया है,
वफादारी से
क्यों, आज
पीछे हट गया है !











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सायफन


पानी और आदमी का
पल-पल का साथ है
काश !
पानी का सिर्फ एक गुण
आदमी मे आ जाता,
आज,
आदमी, आदमी की सतह
बराबर कर पाता !











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बचाव


दिल तक
दुल्हन,
सास-ससुर के
पहुँच जाती है,
ज़िद करके बाप से
जब दहेज,
खूब लाती है !











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लज्जा


लज्जा जैसा आभूषण
नारी का,
आज नहीं खोता,
यदि
साड़ी में
जेब होता !











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लकीरें



लक्ष्मण रेखा से
रेखाओं का सिलसिला
आज तक
चला आ रहा है,
ग़रीबी रेखा से
ग़रीब
बाहर ही नहीं आ रहा है !










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-रमेशकुमार भद्रावले
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शब्द प्राणायाम - 91 - 95

प्रगति


जाने क्यों आदमी
दिन को भी,
रात बना रहा है,
सूर्य की रोशनी मे भी
बिजली का बल्ब,
जला रहा है !












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परिभाषा


प्रजात्रंत की भी
एक परिभाषा है,
पाँच साल का
अन्तर,
आदमी और नेता में
हो जाता है !











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गणेश चतुर्थी


गणेश चतुर्थी और
गणेश विसर्जन ने भी
आदमी को कुछ
सिखाया है,
प्रजातंत्र में
कुर्सी पर
बैठाने-उठाने का,
नया दौर चलाया है !










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दुर्घटना


स्वार्थ ने,
मानवता का साँधा
बदल दिया है,
आज आदमी, आदमी की
पटरी से
उतर गया है !











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विकलांग वर्ष


लाठी भी
विकलांग वर्ष
मना रही है,
देकर सहारा
अन्धें को
चला रही है !












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-रमेशकुमार भद्रावले
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शब्द प्राणायाम - 86 - 90

बढ़ावा


भ्रष्ट,
राजनीति और नेता
देश को
किस तरफ ले जा रहे हैं,
बच्चे की तरह दूध
आतंकवाद को
पिला रहे हैं !














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आशा


उन घरों में भी
कभी मौज मस्ती होगी
जिस दिन
आदमी की नहीं
शराब की,
मौत होगी !















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दुर्लभ प्रजाति


देश में,
बिजली का टोटा
क्या हो गया,
आज
विलुप्त एवं दुर्लभ प्रजाति
कीड़ा,
बिजली का हो गया है !
















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शर्म


हल्ला,
पानी बचाओ.....बचाओ का
उस तक भी
पहुँच गया,
बेचारा
बिना टोंटी का नल भी
बंद हो गया !















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परख


कसौटी पर
परखने का रिवाज़
आदमी ने निकाला है,
आज तक,
आदमी-आदमी को
नहीं समझ पाया है !















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-रमेशकुमार भद्रावले

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05 January 2006

शब्द प्राणायाम - 81-85

जीत


गुलाल, माथे का
चिह्न, बनकर
दिल पर
उभर आता है,
तभी नेता
जनता के बीच
होली मनाता है !














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दर्शन


फूटकर अंडा
कितना उजाला
कर जाता है,
बाँग देकर मुर्गा
आज भी
सूरज को
जगाता है !














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शामिल


जाने दो,
बच्चा है, बूढ़ा है,
इस कतार को
आगे बढ़ाना होगा,
कुछ भी कर डाले
माफ हमें अब,
नेता को भी करना होगा !















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गंदी मछली


सूख कर
हज़ारों की
जान ले लेता है,
तालाब हमेशा
बदनाम,
मछली को करता है !















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मतलब


पत्नी,
यहाँ अपंग 'त' को
अक्षर 'न', ने सँभाला है,
भाषा के लिये
अक्षरों को
विकलांग,
आदमी ने बनाया है !













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-रमेशकुमार भद्रावले