19 December 2005

शब्द प्राणायाम - 36 - 40

रानी

घर ही, नहीं
सदियों से शासन
चला रही है,
एक छत बनाकर
मधुमक्खी,
नारी को सिखा रही है!















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आँकड़ा

राम-लक्ष्मण-सीता को
वनवास क्या हो गया,
आँकड़ा तीन का
आज,
बदनाम हो गया!
















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व्ही.आर.एस

सोने के
पूरे अंडों का लालच
आदमी को
फिर आया है,
फाड़कर पेट
मुर्गी-सी, नौकरी का
खूब पछताया है!














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सुनामी लहरें

बता-बता कर
आँकड़े
हल्ला मचा रहे हैं,
करोड़ों का ख़र्च
चुनावी लहरों का
छुपा रहे हैं!
















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जाँच

काटने लग जाता है
याद,
जब भी उसे
रोटी की आती है,
ख़ून में
मलेरिया नहीं
मच्छर की भूख आती है!














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-रमेशकुमार भद्रावले
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