31 December 2005

शब्द प्राणायाम - 61-65

सच्चाई


मुसीबत में आदमी
आज
कुछ इस तरह
ढल रहा है,
कि रोता आदमी भी
आज,
हँसता लग रहा है!
















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बल्ब


बिजली के बल्बों ने
फ्यूज होकर,
आदमी को भी
कुछ सिखाया है,
सीधा सच्चा
हार्ट अटैक का,
नया दौर चलाया है!















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मौत-लहर


लाठियों से
जहाँ,
हमेशा लकीरें पिटती रही हैं,
जिन्दा है, साँप
लहर मौत की
चलती रही है !















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दबे पाँव


"दबे पाँव" में
कितना पीछे
बिल्ली को
बिजली छोड़ जाती है,
हज़ारों किलोवाट वाली
पतले से तार से
निकल जाती है!














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फागुन



साल का हर महीना
मस्ती के रंग में
रंग जाता,
यदि फागुन खुद
अपने साथियों के साथ
होली खेल जाता!













-रमेश कुमार भद्रावले
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