31 December 2005

शब्द प्राणायाम - 66 - 70

पाखंड


धर्म की
पगडण्डी पर
आदमी,
भटक रहा है,
आज भी
आदमी, आदमी की
राह पर नहीं
चल रहा है !















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परिवर्तन


परिवर्तन को
आदमी ने
यूँ ढ़ाला है,
बारह माह से
पाले
कलेण्डर को
एक दिन की
जनवरी ने,
बदल डाला है!















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दशहरा-२


रावण को मारकर
राम ने,
सीता को तो बचा लिया,
काश,
ऐसा कोई राम होता
जो आज,
आदमी में छिपे रावण को
मार पाता !















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दीपावली-२


दीपावली
आदमी, कुछ इस तरह से
मना रहा है,
अपने ही हाथों
अपने ही घर को
चूना,
लगा रहा है!














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क़ौमी एकता


आदमी से आदमी को
सजा लो,
गुलशन का हर एक
फूल लेकर
क़ौमी एकता का
आज एक
गुलदस्ता बनालो !












-रमेश कुमार भद्रावले

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