31 December 2005

शब्द प्राणायाम - 71 - 75

बदलाव-२


दायरा
सुरक्षा का
क्या
इतना बढ़ जायगा,
सास को
अब,
बहू जलायेगी
कानून,
बचा ले जायगा !
















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अंतर


कुछ लोग
ज़िन्दगी भर
झूठ बोल-बोल कर
पेट भरते रहे,
कुछ मेहनत कर-कर के
भूखे रहे !















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बाबू


मुहँ और मतलब
देखकर,
आदमी-सा
काम का आदी हो जायगा,
दिल
जिस दिन,
कम्प्यूटर में डल जायगा !















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प्रजातंत्र


बिना तालमेल के
बस, अपना
झंडा गाड़ दिया,
मतभेदों की खटाई ने
दूध-सा,
राजनीति को आज
फाड़ दिया !
















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वैभव


चाँद पर
धब्बा जो पड़ गया,
गोरे मुख पर
काले धंधों का
तिल जैसा,
सम्मान बढ़ गया!















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-रमेश कुमार भद्रावले

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