शब्द प्राणायाम - 76 - 80
परम्परा
साधू के वेश में
सीता का हरण
क्या हो गया,
विश्वासघात के रावण का
आज,
चलन हो गया!

सफाई
अफसर,
कितना ही बड़ा हो
झाडू तो लगायेगा,
कचरा चेहरे का
रोज़ सबुह
ब्लेड,
से हटायेगा !

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पानी-फेरना
मिटाने के लिए,
सदियों से
आदमी,
ठस-ठस पीता है,
रोटी खाकर
भूख पर
पानी,
फेरता है !

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आँसू
नकल,
रोती आँखों की
वह भी
कर रहा है,
गर्मी में
बूँद-बूँद
नल,
टपक रहा है !

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भाग्य
काश,
कड़वे बबूल में भी
भगवान, आम देता,
बो कर,
पेड़ कोई भी
आदमी,
फल मीठा खा लेता !

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-रमेश कुमार भद्रावले
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