08 January 2006

शब्द प्राणायाम - 102 - 107

धरातल


आदमी के
आकलन का पैमाना
आज,
यू चलता है,
बड़ा वो है
जो ज़मीन पर नहीं,
परदे पर चलता है !









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स्मृति


भुलावे की
कोई आँधी
नहीं बुझा पाती,
यादों की तुम्हारी
नन्हीं बाती !










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योग


परम्परा
ऋषि-मुनियों की
शब्द भी,
निभा रहे हैं,
योग और प्राणायाम से
भाषा को
समृद्ध और निरोगी
बना रहे हैं !











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साधना


कड़ी मेहनत और
साधना में ढली
जेम्सवॉट की भाप को
बच्चों का खेल
मत बनाओ,
एक के पीछे एक आओ
रेल बनाओ, रेल बनाओ !










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जुआँ


बन्दर की तरह
आपस में, माँ -बेटी
देखते-देखते जुआं
एक षड़यंत्र रच देती हैं,
दहेज के नाखूनों पर
जुआं की तरह
बहू को,
मसल देती हैं !










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हैजा


हैजे की तरह
पाप और अत्याचार से
पृथ्वी,
जब त्रस्त हो गई,
निकलकर
जटाओं से गंगा
बाटल,
ग्लूकोज की हो गई !










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-रमेशकुमार भद्रावले

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